कपड़े का सही इस्तेमाल हम भारतीय ही जानते है।

एक बार एक पजामा पहने हुए हिन्दुस्तानी से एक
अंग्रेज ने पूछा, “आप का यह देशी पैंट (पजामा)
कितने दिन चल जाता है?
हिन्दुस्तानी ने जवाब दिया, “कुछ ख़ास
नहीं, मै इसे एक साल पहनता हूँ। उसके बाद
श्रीमति जी इसको काट कर राजू के साइज़
का बना देती है। फिर राजू इसे एक साल पहनता है।
उसके बाद श्रीमति जी इसको काट छांट कर
तकियों के कवर बना लेती है। फिर एक साल बाद उन
कवर का झाडू पोछे में इस्तेमाल करते हैं।”
अंग्रेज बोला, “फिर फेंक देते होंगे?”
हिन्दुस्तानी ने फिर कहा, “नहीं-
नहीं इसके बाद 6 महीने तक मै इस से
अपने जूते साफ़ करता हूँ और अगले 6 महीने तक
बाइक का साइलेंसर चमकाता हूँ। बाद में
मारदडी की हाथ से
बनायीं जाने वाली गेंद में काम लेते हैं और
अंत में कोयले की सिगडी (चूल्हा) सुलगाने
के काम में लेते हैं और सिगड़ी (चुल्हे)
की राख बर्तन मांजने के काम में लेते हैं।”
इतना सुनते ही अंग्रेज रफू चक्कर हो गया।

संयोंगिता कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री थी। वह बड़ी ही सुन्दर थी, उसने भी पृथ्वीराज की वीरता के अनेक किस्से सुने थे। उसे पृथ्वीराज देवलोक से उतरा कोई देवता ही प्रतीत होता था। वो अपनी सहेलियों से भी पृथ्वीराज के बारे में जानकारियां लेती रहती थी। एकबार दिल्ली से पन्नाराय चित्रकार कन्नौज राज्य में आया हुआ था। उसके पास दिल्ली के सौंदर्य और राजा पृथ्वीराज के भी कुछ दुर्लभ चित्र थे। राजकुमारी संयोंगिता की सहेलियों ने उसको इस बारे में जानकारी दी। फलस्वरूप राजकुमारी जल्दी ही पृथ्वीराज का चित्र देखने के लिए उतावली हो गयी। उसने चित्रकार को अपने पास बुलाया और चित्र दिखने के लिए कहा परन्तु चित्रकार उसको केवल दिल्ली के चित्र दिखता रहा परन्तु राजकुमारी के मन में तो पृथ्वीराज जैसा योद्धा बसा हुआ था। अंत में उसने स्वयं चित्रकार पन्नाराय से महाराज पृथ्वीराज का चित्र दिखने का आग्रह किया। पृथ्वीराज का चित्र देखकर वो कुछ पल के लिए मोहित सी हो गयी। उसने चित्रकार से वह चित्र देने का अनुरोध किया जिसे चित्रकार ने सहर्ष ही स्वीकार लिया। इधर राजकुमारी के मन में पृथ्वीराज के प्रति प्रेम हिलोरे ले रहा था वहीं दूसरी तरफ उनके पिता जयचंद पृथ्वीराज की सफलता से अत्यंत भयभीत थे और उससे इर्ष्या भाव रखते थे। चित्रकार पन्नाराय ने राजकुमारी का मोहक चित्र बनाकर उसको पृथ्वीराज के सामने प्रस्तुत किया। पृथ्वीराज भी राजकुमारी संयोगिता का चित्र देखकर मोहित हो गए। चित्रकार के द्वारा उन्हें राजकुमारी के मन की बात पता चली तो वो भी राजकुमारी के दर्शन को आतुर हो पड़े। राजा जयचंद हमेशा पृथ्वीराज को निचा दिखने का अवसर खोजता रहता था। यह अवसर उसे जल्दी प्राप्त हो गया उसने संयोगिता का स्वयंवर रचाया और

पृथ्वीराज को छोड़कर भारतवर्ष के सभी राजाओं को निमंत्रित किया और उसका अपमान करने के लिए दरबार के बाहर पृथ्वीराज की मूर्ती दरबान के रूप में कड़ी कर दी। इस बात का पता पृथ्वीराज को भी लग चूका था और उन्होंने इसका उसी के शब्दों और उसी भाषा में जवाब देने का मन बना लिया। उधर स्वयंवर में जब राजकुमारी संयोगिता वरमाला हाथो में लेकर राजाओ को पार करती जा रही थी पर उसको उसके मन का वर नज़र नहीं आ रहा था। यह राजा जयचंद की चिंता भी बढ गयी। अंतत: सभी राजाओ को पार करते हुए वो जब अंतिम छोर पर पृथ्वीराज की मूर्ति के सामने से गुजरी तो उसने वही अपने प्रियतम के गले में माला डाल दी। समस्त सभा में हाहाकार मच गया। राजा जयचंद ने अपनी तलवार निकल ली और राजकुमारी को मारने के लिए दोड़े पर उसी समय पृथ्वीराज आगे बढ कर संयोगिता को थाम लिया और घोड़े पर बैठाकर निकल पड़े।
पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेमकथा राजस्थान के इतिहास में स्वर्ण से अंकित है।